दहेज प्रथा समाज का आधुनिक दोष और वर्तमान स्थिति एवं उसे रोकने के उपाय

“काम नहीं चलता दहेज से इसकी मांग बनती छोटा, दहेज लालच की काई से मानव बन जाता खोटा।
पुत्र बेचकर खुश ऊपर से लेकिन अंदर से दिल है रोता, द्रव्य -वित्स्ना बढ़ जाती है, नहीं चैन से सोता है।”

दहेज प्रथा (Dowry System) आज हमारा देश एक ऐसे मोड़ पर खडा है जहाँ से हमे एक ऒर तो अपना उज्वल अतीत दिखाई पड़ता है और दूसरी ऒर कल्पनाओ के सुनहरे रंग में रंगा हुआ दूरगामी भविष्य जिसमे आशा की उज्वल किरणे कभी टिमटिमाती है और कभी डगमगाती – डूब जाती है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारा अतीत उज्वल था यह भी आशा की जा सकती है कि अतीत से प्रेरणा लेकर ही हम बदलते हुए समाज में प्रवेश करते ही है कि कोई न कोई बड़ी बाधा हमारा रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है। इसी बाधा में एक बड़ी बाधा दहेज प्रथा है जो समाज पर कलंक के रूप में मंडरा रही है जो समाज को विकसित होने से रोकती है।

वर्तमान युग शिक्षा का युग होने के बाद भी भारत में दहेज प्रथा के मामले बढ़ते जा रहे है। वर्तमान समय में दहेज प्रथा इस देश के लिए अभिशाप बन चुका है। आज भी इस 21 सदी में बेटी के जन्म लेते ही ज्यादातर माता -पिता के सिर पर चिंता सवार हो जाती है। माता-पिता को चिंता इस बात की नहीं होती है कि लड़की की पढ़ाई कैसे करवाएगे ?

माता-पिता को चिंता इस बात की होती है कि कैसे करवाएगे और विवाह के लिए दहेज देना पड़ेगा और वो कैसे इकट्ठा करे ? जब भी ज्यादातर घरो में बेटी पैदा होती है तो उनके लिए वो दुःख का दिन होता है। क्योकि इसका सबसे बड़ा कारण है दहेज प्रथा।

दहेज प्रथा का अर्थ ?

वे उपहार जो एक पिता या उसके अभिभावको द्वारा अपनी बेटी को उसकी शादी के समय दिए जाते है ताकि वह आगे का जीवन खुशहाली से यापन कर सके।

दहेज प्रथा की शुरुआत

दहेज प्रथा की शुरुआत कब हुई यह सही से कह पाना तो बहुत मुश्किल है परन्तु यह बता सकते है कि यह प्राचीन काल से चली आ रही है। हिन्दु जाती के महान पौराणिक कथाओ या ग्रंथो जैसे रामायण तथा महाभारत में कन्याओ की विदाई के समय पर माता -पिता द्वारा दहेज के रूप में धन – सम्पति देने का उदाहरण मिलता है। परन्तु उस समय लोग दहेज को स्वार्थ की भावना से नहीं लेते थे। और लड़के वालों की ओर से कोई मांग नहीं की जाती थी।

विवाह को एक पवित्र एवं धार्मिक बंधन माना जाता है जिसमे दो परिवारों का मिलन होता है उस समय दहेज लड़की के माता – पिता लड़की के लिए सामान के रूप में दिया करते थे। ये बिना लोभ के लड़के वाले रख लेते थे। परन्तु जैसे – जैसे समय बीतता गया और हिन्दु समाज में यह प्रथा भी आगे बढ़ती गई।

वर्तमान समय में यह दहेज लेना एक लालच बन गया है। शुरुआती समय में तो दहेज में जेवर और कपड़े ही देते थे। लेकिन वर्तमान समय में यदि लड़का सरकारी नौकरी पर है तो लड़के के माता – पिता सामने वालो से गाड़ी, सम्पति और रकम की मांग करने लग गए है।

दहेज प्रथा समाज का आधुनिक दोष

यदि हम प्रचीन इतिहास पर नजर डाले तो यह पाते है कि वैदिक काल से लेकर राजपूतो के सामन्ती युग तक दहेज का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। उस समय कन्या को पाने लिए अनेक राजकुमार स्वंयवरो में जाकर अपनी योग्यता को प्रमाणित करते थे।

शांतनु जैसे राजा एक सामान्य मल्लाह से उसकी कन्या से विवाह के लिए याचना करते थे। राम और अर्जुन जैसे वीरो को भी सुयोग्य कन्या के साथ विवाह के लिए अपनी वीरता प्रमाण देना पड़ा था।

लेकिन समय के परिवर्तन के साथ लोगो में स्वार्थ भावना उत्पन होने लगी और कुछ लोग स्वार्थ से प्रेरित होकर इस प्रथा को भारतीय संस्कृति अन्तर्गत प्राचीन परम्परा सिद्ध करने का प्रयास करते है।

यहां तक कि कुछ शिक्षित लोग वेदों जैसे महान ग्रंथों को भी इस प्रथा का मूल खोजने का प्रयास करते है। परन्तु जिन ऋषियों ने वेदो और पुराणों की रचना की है। उन ऋषियों में से किसी ने भी इस निंदनीय प्रथा का न तो समर्थन किया है और न ही इससे संबन्धित मंत्र लिखा है।

प्राचीन काल में अपनी पुत्री को उपहार के रूप में जो देना चाहे वह दे सकते थे। लेकिन वर्तमान समय में इसका गलत उपयोग करके लड़की वालों से मांग करके लेने लगे है जो समाज के लिए एक आधुनिक दोष है। क्योकि एक शिक्षित समाज भी आज के समय में मांग कर दहेज लेने लगा है। और दुसरो को दहेज न लेने की शिक्षा दे रहा है। ऐसे लोगो के कारण दहेज समाज के लिए दोष साबित हो रहा है।

“प्रेम खरीदा नहीं जाता, वह समर्पण चाहता है।”

दहेज प्रथा के खिलाफ कानून

दहेज प्रथा भारतीय समाज में सबसे जघन्य सामाजिक व्यवस्थाओं में से एक है। इसमें कन्या भ्रुण हत्या, बालिकाओं का परित्याग, बालिका के परिवार में आर्थिक समस्याओं, धन कमाने के लिए अनुचित साधनो, बहु के साथ भावनात्मक और शारीरिक रुप शोषण करना आदि मुद्दों को जन्म देता है।

इन सब समस्याओ से निपटने के लिए सरकार ने कई कदम उठाये है। सरकार ने दहेज को दंडनीय अपराध मानते हुए इसके विरुद्ध कानून बनाए है जो इस प्रकार है –

  • दहेज प्रथा निषेध अधिनियम 1961 – देश में दहेज प्रथा को रोकने के लिए सर्वप्रथम 1961 में दहेज निषेध अधिनियम बनाया गया। इस अधिनयम में दहेज लेने और देने दोनों को निषेध बताते हुए दोनों पर जुर्माना लगाया गया था। इसमें दहेज लेने और देने पर न्यूनतम 5 वर्ष की सजा या 15000 रूपये का जुर्माना या दोनों लगाया जाता था। इस अधिनियम में दहेज की मांग करने को भी दंडनीय माना गया था। कोई भी दहेज की मांग भी करता था तो उसको 6 माह की सजा या 10000 रुपये का जुर्माना या दोनों लगाया जाता था।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 में महिलाओं का संरक्षण – देश में बढ़ती जनसख्या और बदलती परिस्थियों के अनुसार देश में नए कानून की आवश्यकता होने लगी तब देश की संसद द्वारा घरेलू हिंसा से महिला सरक्षंण अधिनियम 2005 लाया गया। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य यह है कि सभी महिलाओ को उनके साथ हो रही शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक या यौन शोषण से बचाना है। दहेज के लिए भी बहु को इसी रूप से प्रताड़ित किया जाता है।

दहेज प्रथा की वर्तमान स्थिति

वर्तमान समय में दहेज प्रथा का प्रचलन चल रहा है। सरकार द्वारा दहेज प्रथा के विरुद्ध कानून तो बनाये गए है। पर देश में अधिक आबादी होने के कारण इन कानून का सही से लागू नहीं करा पाने के कारण दहेज प्रथा पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध नहीं लगा पा रहे है। पूरी तरह से प्रतिबंध नहीं होने के कारण आज भी लोग दहेज की मांग करते जा रहे है।

वर्तमान समय में यह स्थिति है कि शिक्षित एवं शहरों में रहने वाले माता – पिता अपने बेटे की सरकारी नौकरी एवं शहर में निवास करने के कारण दहेज की अधिक मांग करने लगे है। वही दूसरी तरफ गाँव के लोग दहेज की मांग कम कर रहे है।

आज के समय में यह देखने को मिल रहा है कि एक गरीब माता – पिता अपनी बेटी की शादी अच्छे परिवार में नहीं करा सकते है। अतः इस दहेज प्रथा को रोकने के लिए जनता को जागरूक होना पड़ेगा और सरकार द्वारा बनाये गए कानून का कठोरता से पालन करना होगा। सरकार के साथ मिलकर इसका विरोध करना होगा।

दहेज प्रथा को रोकने के उपाय

  1. शिक्षा – शिक्षा का आभाव भी दहेज प्रथा को बढ़ावा देने का एक कारण है लोगो में सरकारी नौकरी पाने की शिक्षा बचपन से ही दी जाती है। पर उनको समाज किस प्रकार से रहना है और अपनी सस्कृति की शिक्षा नहीं दी जाती है। दहेज प्रथा रोकने के लिए लोगो मको समाज और अपनी सस्कृति की शिक्षा देना आवश्य्क है।
  2. महिला सशक्तिकरण – अपनी बेटियों के लिए एक अच्छे दूल्हे की तलाश करने और बेटी की शादी में सारे पैसे खर्च करने की बजाय लोगो अपनी बेटी की शिक्षा पर खर्च करने चाहिए और उसे आत्म निर्भर बनाना चाहिए ताकि बेटिया शादी के बाद ससुराल वालो की तरफ रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ सके।
  3. लैगिंक समानता – हमारे समाज के मूल में मौजूद लैगिंक असमानता दहेज प्रथा के मुख्य कारणों में से एक है। बहुत कम उम्र से बच्चो को सिखाया जाना चाहिए कि पुरुषो और महिलाओ दोनों को समान अधिकार है। और एक दूसरे से बेहतर है ख़राब नहीं है।

निष्कर्ष – दहेज प्रथा लड़की और उसके परिवार के लिए पीड़ा का कारण है। एक समस्या से छुटकारा पाने के लिए सरकार एवं जनता को एक जुट होकर इसके विरुद्ध लड़ाई होगी। और सरकार द्वारा बनाए गए कानून का कठोरता से पालन करना होगा। एवं दहेज प्रथा के विरुद्ध दहेज रोको अभियान चलकर लोगो में जागरूकता लानी होगी जिससे की दहेज प्रथा को रोका जा सके।